Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अपि स्फुटति विन्ध्याद्रौ वाति वा प्रलयानिले ।
पौरुषं हि यथाशास्त्रमतस्त्याज्यं न धीमता ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव शास्त्रीय प्रयत्नो मे दढ अभिनिवेश करना चाहिए, यह कहते है।
इसलिए विन्ध्याचल के फूटने या प्रलयकालीन झंझावात के बहने पर भी बुद्धिमान् पुरुष को
शास्त्रानुसारी प्रयत्न नहीं छोड़ने चाहिए अर्थात् सर्वदा उन्हीं का आश्रय करना चाहिए, यह भाव हे