Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अर्जुन उवाच ।
तन्मृतोऽस्मीति भगवन्किंकृता तु नृणां स्थितिः ।
कथं स्थितौ च लोकानां तौ स्वर्गनरकौ प्रभो ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यो अपरिच्छिन्न आत्मा के मरणादि-परिच्छेद और दुःखादि-भ्रम मे हेतु क्या है ?
अर्जुन ने कहा : हे भगवन्, तब तो में मृतक हूँ” इस प्रकार मनुष्यों की मरणस्थिति किस हेतु से
प्राप्त होती है ओर उस स्थिति में हे प्रभो, लोगों को प्रसिद्ध स्वर्ग ओर नरक यानी सुख और दुःख कैसे
होते हैं ?