Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।
स्वप्नोपमाना तेनेह श्रेयसे वासना क्षयः ।
चिराभ्यासवशात्प्रौढा संसारभ्रमकारिणी ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरा कोई कारण तो संभव नहीं है । ईश्वर, काम, कर्म आदि भी वासना के अनुसार ही सुखदुःख
आदि प्राप्त कराते हैं, अतः एकमात्र दीर्घकाल के अभ्यास से दृढ़ हुईं वासना ही संसार के प्रति कारण
है । इसलिए मोक्षार्थियों को उस वासना का क्षय ही सब प्रयत्नों से करना चाहिए, इसी आशय को स्पष्ट
कर रहे श्रीभगवान् कहते है ।
श्रीभगवान् ने कहा : पार्थ, चूँकि शास्त्रीय प्रयत्नो की शरण न लेकर चिरकालिक अभ्यास से प्रोढ
हुई स्वप्न-तुल्या यह वासना संसाररूप भ्रम को देनेवाली है, इसलिए तत्त्वज्ञान के अभ्यास से
समूलवासना का क्षय ही यहाँ तुम्हारे कल्याण के लिए है