Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verses 39–40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verses 39–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 39,40
संस्कृत श्लोक
अर्जुन उवाच ।
वासनाविलये जीवो विलीनो भवति स्वयम् ।
यो हि यत्सत्तयोच्छूनस्तन्नाशात्स विलीयते ॥ ३९ ॥
जीवे विलयमायाते देशकालान्यथाकृतौ ।
कोऽसौ भाजनतामेति जन्मनो मरणस्य च ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
वासनामय ही लिंग शरीर है और उसमें प्रतिबिम्बस्वरूप जीव भी वासना से ही उत्पन्न है अतः
वासना का क्षय होने पर जीव का क्षय ही हो जायेगा । एवं तत्त्वज्ञान और वासना का क्षय दोनों केवल
अनर्थ के लिए ही होंगे ? इस आशय से अर्जुन शंका करते हैं।
अर्जुन ने कहा : जो जिसकी सत्ता से स्थित रहता है, वह उसके नाश से नष्ट होता है, अतः वासना
के विलीन हो जाने पर स्वयं जीव भी विलीन हो जायेगा । जीव के विलीन हो जाने पर तथा देश और
काल का अन्यथाकरण होने पर (%) जन्म (परमानन्द के आविभवस्वरूप परम पुरुषार्थ) एवं मरण
(४) यहाँ पर "जन्म-मरण" शब्द से प्रसिद्ध जन्म-मरण का ग्रहण नहीं किया जा सकता, क्योकि
तत्त्वज्ञ में समूल वासना का नाश होने पर उनकी प्रसक्ति ही नहीं है ओर वह (उनका ग्रहण करना)
(आत्यन्तिक अनर्थनाश) का कौन भागी होगा अर्थात् कोई नहीं, यह भाव है