Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
दुर्दर्शनस्य गगने शिखिपिच्छिकेव सूक्ष्मा परिस्फुरति यस्य तु वासनान्तः ।
मुक्तः स एव भवतीह हि वासनैव बन्धो न यस्य ननु तत्क्षय एव मोक्षः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
कहे गये समाधान का संक्षेप से उपसंहार करते है ।
पार्थ, अपनी ही माया से आच्छादित हो जाने के कारण स्वरूप -दर्शन में अयोग्य हुए, वेदान्तप्रमाण
को प्राप्त न किये हुए जिस परमात्मा के भीतर, आकाश में ऐन्द्रजालिक मोरपंख की नाई, नाना
प्रकार के भ्रमों को उत्पन्न करनेवाली सूक्ष्म वासना जीव-जगद्रूप से प्रस्फुरित होती है, वही (परमात्मा)
अधिकारी शरीर में वेदान्तशास्त्र को प्राप्तकर उदित तत्त्वज्ञानवाला होता हुआ समूल वासनारूप
बन्ध से मुक्त हो जाता हे । क्योकि इस परमात्मा में समूल वासना ही बन्ध (संसार) है ओर उसका
क्षय ही मोक्ष है