Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
न हि शीर्यत्यचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ में 'अशीर्यो नहि शीर्यते“ इस श्रुति को प्रमाणरूप से उपस्थित कर रहे भगवान् शीर्णता
आदि देह के धर्म हैं, इन्हे आत्मा मे प्रसक्त करनेवाला आभिमानिक परिग्रह (अहंबुद्धि) ही है। अहंबुद्चि
का त्याग हो जाने पर तो शीर्णतादि की प्रसक्ति नहीं होती, यह कहते हैं।
सम्पूर्ण परिग्रहों से रहित अतएव देहादि के परिग्रह में निमित्तभूत चित्त से विविक्त आत्मा नष्ट नहीं
होता ओर युद्धादि कर्म में प्रवृत्त हुआ भी वह कुछ नहीं करता