Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
भावितात्मासि कौन्तेय सत्यं विज्ञातवानसि ।
अयं सोहं जना एते मयेति त्यज वासनाम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें तुम्हें विचार से आत्म-स्वरूप का परिचय तो हो गया है, अब तुम्हारे लिए उसकी ढता से
देह और उसके सम्बन्धी बन्धु आदि में अहम्” मम" इत्यादिरूप वासना का क्षय करना ही एकमात्र
कार्य अवशिष्ट रह जाता है, यह कहते हैं।
हे कौन्तेय, तुम पवित्रात्मा हो चुके हो ओर सत्य का ज्ञान भी तुम्हें हो चुका है। अब तुम "यह', “वही
मैं” और “ये लोग मेरे बान्धव हैँ" इत्यादिरूप वासना को छोड़ दो