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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

जीवन्नेव महाबाहो तत्त्वं प्रेक्ष यथास्थितम् । वासनावागुरोन्मुक्तो मुक्त इत्यभिधीयते ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

और वही समूलवासना-निवृष्ति देहधारणपर्यन्त “जीवन्मुक्ति इस नाम से प्रसिद्ध है, उसका इसी लोक में तुम भी अनुभव कर सकते हो । इसलिए “मुक्तिरूप फल का भाजन कौन होगा ?' ऐसा तुम्हें संशय नहीं करना चाहिए, इस आशय से कहते है । हे महाबाहो अर्जुन, वासनारूप रज्जुबन्धन से छटा हुआ पुरुष “मुक्त” यों कहा जाता हे । अतः वासना से निर्मुक्त होकर जीते हुए ही (इसी वर्तमान देह में ही) यथास्थित उस तत्त्व को तुम देखो