Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव मैंने पहले ही कह दिया था कि सत् भाव का असत्त्व के साथ विरोध होने से देहादि में सत्व
नहीं है, यह कहते हैं।
सत् से विलक्षण असद्रूप इस जगत् का भाव (अस्तित्व) नहीं हो सकता और सत्स्वरूप ब्रह्म
का अभाव यानी असत्त्व नहीं हो सकता है । इस प्रकार सत् ओर असत् इन दोनों के विषय में सत्
सत् ही है और असत् असत् ही है, विपरीत नहीं यों तत्त्वदर्शियों ने निर्णय किया है, मूर्खो ने नहीं,
यह भाव हे