Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verses 41–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, verses 41–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 41,42
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।
स्वयं कल्पितसंकल्पमात्मरूपं यदाविलम् ।
तदेव वासनाकारं जीवं विद्धि महामते ॥ ४१ ॥
अनायत्तमसंकल्पमात्मरूपं यदव्ययम् ।
प्रबोधाद्वासनामुक्तं तन्मोक्षं विद्धि भारत ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
(तुम्हारे द्वारा उद्भावित उपर्युक्त) दोष तव होता जव प्रतिविम्बमात्र संसारी जीव है ओर वह भी
बिम्बभूत ब्रह्म से अन्य तथा भूतमात्राओं के अधीन जन्म आदि, देश एवं काल भेद से भिन्न है यह माना
जाता, परन्तु वैसी तो बात नहीं है, किन्तु परमार्थतः शुद्ध ब्रह्म ही होकर असत्यभूत अपनी अविद्या से
आवृत अपने वास्तविक तत्त्व को नहीं जान रहा वह अपनी आत्मा में ही जीव जगत् भेद की कल्पना
द्वारा संसारी-सा बन जाता है। और वही श्रवण, मनन आदि शास्त्रीय प्रयत्नो से अपने वास्तविक तत्त्व
का ज्ञानकर वासना के साथ अविद्या को धोकर स्वस्वभावे स्थित हो जाता है। मानों वही इसकी
मुक्ति है यही श्रुतिसम्मत सिद्धान्त है । इस सिद्धान्त में तुम्हारे द्वारा उद्भावित कोई भी दोष नहीं
आता, इस आशय से भगवान् समाधान करते है ।
श्रीभगवान् ने कहा : हे महामते अर्जुन, ब्रह्म का जो रूप अपने ही कल्पित संकल्प से कलुषित
(अविद्या से आवृत) हो जाता है, उसे ही वासनाकृति जीव जानो । हे भारत, दूसरे के अधीन न हुआ,
संकल्परहित ओर अविनाशी जो यह आत्मरूप तत्त्वज्ञान के कारण वासना से शून्य हो जाता है, उसे ही
तुम “मोक्ष' जानो