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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 127

एक सौ खब्बीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग रामजी की विश्रान्ति, भरद्वाज मुनि की उत्कण्ठापूर्वक उक्तियाँ, जाग्रत्‌ आदि अवस्थाओं के लक्षण तथा तुरीय पद ~ इनका वर्णन ।

33 verse-groups

  1. Verse 1यहाँ तक श्रीवसिष्ठ मुनि ओर श्रीरामजी का परस्पर संवाद हुआ उसे सुनाकर वाल्मीकि मुनि रामजी क…
  2. Verse 2जितना उपदेश रामजी ने सुना उतना तुमने भी तो सुना, यदि तुम्हें सन्देह की निवृत्ति हुई है, त…
  3. Verses 3–6यों पूछे गये वाल्मीकिजी प्रश्न की द्वितीय कोटिका कथाशेष से समर्थन करते हुए उत्तर देते है।…
  4. Verses 7–9इस प्रकार उत्तम अधिकारी श्रीरामचन्द्रजी को ज्ञान की प्राप्ति हुई, यह वर्णन कर अव मन्द, मध…
  5. Verse 10इस प्रकार पूछे गये वाल्मीकि मुनि 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्‌” न्याय से सिद्ध श्रुत ग्रन्थो की…
  6. Verse 11चूँकि यह सारा प्रपंच मिथ्याभूत अविद्या से उत्पन्न हुआ है, इसलिए प्रपंच झूठा है और आखिर मे…
  7. Verse 12मिथ्याभूत दवेत प्रप से वास्तव अद्वैत वस्तु की हानि नहीं होती, यह कहते हैं। हे प्रियमित्र,…
  8. Verses 13–14सबसे पहले प्रणव की प्रथम मात्रा से बोधित होनेवाला जगत्प्रपंच का मिथ्यापन, उसके साक्षी का…
  9. Verses 15–17जो वस्तु असत्‌ रहती है, वह भी अनादि वासनायुक्त अविद्या से, गन्धर्वनगर के सदश, दिखलाई पड़त…
  10. Verse 18जब तक अज्ञान रहता है, तभी तक चितिरूपी नदी में जगत्‌-रूपी तरंगों का उद्भव होता रहता है, यह…
  11. Verses 19–21जो वस्तु आदि और अन्तकाल मे नहीं रहती, वह मध्य में भी नहीं रह सकती, क्योंकि जिसका जो स्वभा…
  12. Verse 22अब वाल्मीकिजी अज्ञान का लवणसागर के रूप में वर्णन करते हैं। अकेला अज्ञानरूपी समुद्र ही समस…
  13. Verses 23–24छोटे-छोटे तरंगों को दशति हैं। उन-उन विषयों में चित्त के गिरने के जो नानाविध प्रकार हैं, उ…
  14. Verse 25यदि तुम्हें समुद्र में ही ड्ूबना है, तो आनन्दसमुद्र में क्यो नहीं ड्बते, यह कहते हैं। भद्…
  15. Verses 26–28यह संसार श्रीरामजी के लिए तो तत्त्वज्ञान से चला गया, मेरे लिये तो गया ही नहीं, परंतु स्थि…
  16. Verses 29–30किसी समय तत्त्वज्ञानियों को मोह जो दिखाई पड़ता है, वह कैसे ? इस पर कहते हैं। जिस पुरुष को…
  17. Verse 31यह बात अज्ञानियों में नहीं हो सकती, क्योकि अविद्या से आक्रान्त अज्ञानियों को, जल में स्थल…
  18. Verses 32–38अपनी प्रिय वस्तु के नाश से प्राणी को शोक अवश्य होता है। यदि वह प्रिय वस्तु सद्रूप है, तव…
  19. Verse 39अच्छे कुल में उत्पत्ति, सदाचार्‌, वान्द्रायणादि तप तथा अग्निहोत्रादि कर्मो का सम्पादन आदि…
  20. Verses 40–41तब तो भगवान्‌ महेश्वर की उपासना ही करनी चाहिए, यम, नियम, ज्ञान आदि की कोई आवश्यकता नहीं ह…
  21. Verse 42गुरु और शास्त्रों में शिष्य को बोध दिलाने की शक्ति, शिष्य में चित्त की शुद्धि द्वारा ऊहाप…
  22. Verses 43–44किसी बड़े कार्य में सामग्रीहीन पुरुष को ही शोक करना उचित है, महाराजो की नाई सर्वस्म्पन्न…
  23. Verse 45जीवन्मुक्त पुरुषों को दृष्टान्त बनाकर पुण्य-सामग्री रहने पर मुझे बोध अवश्य ही हो जायेगा,…
  24. Verse 46अधिक पुण्य के द्वारा पूर्वजन्म के पापों का नाश होने पर शम, दम आदिरूप अमृत से शीतलता प्राप…
  25. Verses 47–52पुण्योपार्जान के बाद ठढ़ वैराग्य होने पर जो कार्य करना चाहिए उसका उपदेश देतेहै। हे मित्र,…
  26. Verse 53जैसे दूसरे प्राणियों के शरीर आदि का काल भोजन कर डालता है वैसे ही अपने शरीर आदि का भी काल…
  27. Verse 54जो देवयोनि हैं वे भी जब दुष्ट काल के पिण्ड से छूटे हुए नहीं हैं यानी देवताओं को भी जब दुष…
  28. Verses 55–57वास्तव में तुम साक्षीरूप ही हो, इसलिए तुम्हें दूर से केवल संसारलृत्य का कौतुक ही देखना चा…
  29. Verses 58–61जो मंगलमय वस्तु हैं, उन्हें बतलाते हैं। जो पुरुष देव, द्विज ओर गुरुओं के ऊपर परिपूर्ण श्र…
  30. Verse 62जगत्‌ का लय करने में हेतुभूत अपवाद कहने की इच्छा से अध्यारोप द्वारा अनेक प्रकार से स्थित…
  31. Verse 63प्रश्न के अनुसार उत्तर कहने की प्रतिज्ञा करते हैं। जब प्रपंच का लय किया जाता है तब जिस उप…
  32. Verse 64हे भरद्वाज, पूर्वापर ग्रन्थ के विचार में पटु तुम्हारी स्मृति कहाँ चली गई, उसीसे स्वयं ही…
  33. Verse 65पहले अपने अन्तःकरण से तत्त्व का स्वयं ही विचार करना चाहिए, इसीसे वह आत्मवस्तु स्वयं प्राप…