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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 29–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

अविविक्तो जनः शोचत्यकस्माच्च प्रहृष्यति । तत्त्ववित्तु हसन्नास्ते तस्य मोहो विडम्बनम् ॥ २९ ॥ तच्च सूक्ष्ममिदं तत्त्वं तिरोहितमविद्यया । यथा स्थलेषु लोकानां जलेष्वात्मसु संशयः ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

किसी समय तत्त्वज्ञानियों को मोह जो दिखाई पड़ता है, वह कैसे ? इस पर कहते हैं। जिस पुरुष को तनिक भी विवेक नहीं है, वह शोक करता है और अकस्मात्‌ प्रसन्न भी होता है, परंतु जिसको तत्त्वज्ञान हो गया है, वह निरन्तर हँसता ही रहता है, उसे जो किसी समय मोह दिखाई पड़ता है, वह केवल अज्ञानियों की चेष्टा का अनुकरण ही है