Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
नाभिजात्यं न चारित्र्यं न नयो न च विक्रमः ।
बलवन्ति पुराणानि सखे कर्माणि केवलम् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
अच्छे कुल में उत्पत्ति, सदाचार्, वान्द्रायणादि तप तथा अग्निहोत्रादि कर्मो का सम्पादन आदिकूप
(7)) देखिये, श्रुति भी कह रही है : उमासहायं परमेश्वरं प्रभं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम् ।
ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनिं समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात् ॥ इत्यादि ।
वर्तमान काल के पुरुषप्रयत्न पूर्वजन्म के कर्मो की अपेक्षा प्रबल होते हैं, यह तो आप पहले ही सिद्ध कर
चुके हैं, अब फिर आप इश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता क्यों बतला रहे हैं, इस आशंका पर कहते हैं।
हे मित्र, महेश्वर के अनुग्रह के बिना केवल कुलीनता, सदाचारिता, नीति और पराक्रम आदि कुछ
भी नहीं काम कर पाते, क्योकि पूर्वजन्म के कर्म अधिक बलवान् होते हे । पूर्वजन्मों के कर्मों के अनन्त
तथा इस जन्म के पुरुष प्रयत्नों के अल्प होने के कारण ईश्वर के अनुग्रह के बिना उनके ऊपर विजय
नहीं पायी जा सकती, इसलिए ईश्वारानुग्रहरूपी सहायता हृदय में करके ही इस जन्म के पुरुष प्रयत्नों
की प्रबलता पहले सिद्ध की गयी है, उसे छोड़कर नहीं, यह भाव है