Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
पृथिव्यादिमहाभूतपरमाणुमयं जगत् ।
स्थितं यदा तदापीह को गतो योऽनुशोच्यते ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
यह बात अज्ञानियों में नहीं हो सकती, क्योकि अविद्या से आक्रान्त अज्ञानियों को, जल में स्थलबुद्धि
के सदुश, अनात्मा में आत्मबुद्धि रहती है, यह कहते हैं।
प्रसिद्ध जो सूक्ष्म तत्त्व है, वह अज्ञानी लोगों के लिए अविद्या से ढका रहता है, इसलिए उन्हें जल में
स्थल और स्थल में जल का जैसे संशय बना रहता है, वैसे ही कल्पित अनात्मा में आत्मा का और
आत्मा में अनात्मा का संशय बना रहता है, अतः अज्ञानियों के लिए उक्त बात हो नहीं सकती ॥ ३ ०॥
"जगत् परमाणु है“ इत्यादि सिद्धान्त माननेवाले वादियों की रीति से भी विवेक हो जाने पर जब कि
शोक चला जाता है, तब (समस्त जगत् मायामय है“ इस सिद्धान्त में विवेक हो जाने पर तो शोक न
चला जाय, यह शंका तो हो ही नहीं सकती, इस आशय से कहते हैं।
पृथ्वी आदि जितने महाभूत हैं, वे सब परमाणुमय हैं, यह मत यदि मान लिया जाय, तो भी यहाँ
ऐसी कौन आत्मा नष्ट हो गयी, जिसका शोक किया जाय, क्योकि परमाणुवाद में भी देह आदि के
अनात्मा होने के कारण उनके नाश से आत्मा का नाश तो होता नहीं