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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 47–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verses 47–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 47-52

संस्कृत श्लोक

सखे संन्यस्य कर्माणि ब्रह्मणः प्रणयी भव । नेष्यसे यदि संसारचक्रावर्तभ्रमः शमम् ॥ ४७ ॥ तावदेतद्विकल्पोत्थमिदं यावद्बहिर्ग्रहः । प्रतिकूलोऽब्धिरुल्लोले केवलं निश्चले जले ॥ ४८ ॥ अयं किमन्धकरणस्त्वया शोकोऽवलम्ब्यते । निर्वाहयतु सैव त्वां प्रज्ञायष्टिरभङ्गुरा ॥ ४९ ॥ न जातु ते विगण्यन्ते गणनासु गरीयसाम् । ये तरङ्गैस्तृणानीव ह्रियन्ते हर्षशोकयोः ॥ ५० ॥ समारूढं दशादोलामहोरात्रमिदं जगत् । क्रीड्यते षड्विधैः प्रेङ्खैः सखे किमिति खिद्यते ॥ ५१ ॥ सूते संहरति क्षिप्रं पुनः सृजति हन्ति च । जगन्ति बहुपर्यायैः काल एव कुतूहली ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

पुण्योपार्जान के बाद ठढ़ वैराग्य होने पर जो कार्य करना चाहिए उसका उपदेश देतेहै। हे मित्र, यदि अपना कल्याण चाहते हो, तो संसार चक्र के आवर्त में भ्रमण मत करो, (अथवा "संसारचक्रावर्तभ्रमभरमम्‌' इस पाठ के अनुसार - संसार चक्र के आवर्तरूपी भ्रम में यदि तुम भ्रम करना नहीं चाहते, तो) सब कर्मो को छोड-छाडकर श्रवण आदि उपायों से तुम केवल ब्रह्म मे आसक्त हो जाओ। जब तक बाह्य विषयों मे आसक्ति है यानी जब तक ब्रह्म मे आसक्ति नहीं है तभी तक विकल्प से उत्पन्न हुआ यह सब जगत्‌ दिखाई देता है । हे मित्र, जल के तरंगयुक्त होने पर ही समुद्र अपने तट की ओर जाकर उससे टक्कर खा करके विक्षिप्त होता हे, जल के निश्चल रहने पर तो वह केवल जलरूप ही दिखाई देता हे । विवेकज्ञानरूप दृष्टि (चक्षु) को ढक देनेवाले इस शोक का तुम अवलम्बन क्यों कर रहे हो हे मित्र, अभंगुर वह प्रज्ञारूपी यष्टि (छड़ी) ही इस तरह शोक से अन्धे बने हुए तुम्हारा तब तक निर्वाह करे जब तक कि तुम्हारी विवेक दृष्टि खुल नहीं जाती । हर्ष ओर शोक के आत्मज्ञान के उत्साह के विनाशक - तरंगो से, तृणों की नाई, जो लोग इस संसारसागर में बहते हे वे लोग महात्माओं की गणना में कभी नहीं गिने जाते । हे सखे, वह सारा जगत्‌ (जीवसमूह) हर्ष, विषाद आदि अवस्थारूप झूले पर निरन्तर आरूढ है । इसे छः ऋतु रूप या काम, क्रोध आदि रूप छः झूलों से झुलाकर काल- क्रीडा करता है, अतः इसमें तुम खिन्न क्यों हो रहे हो अर्थात्‌ खिलवाड़ करने के लिए कल्पित पदार्थो के संयोग ओर वियोग में खेद करना युक्त नहीं है। इस तरह की नानाविध क्रीडा ओं में उत्कण्ठा रखनेवाला एकमात्र काल ही अनेक उपायों से एक के पीछे एक अनेक जगतो को उत्पन्न करता हे, विनाश करता है, फिर तत्काल ही उत्पन्न करता है और फिर विनाश करता है