Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
स्वयं विचार्यं स्वयमेव चेतसा तत्प्राप्यते येन न शोचते पुनः ।
सत्संगसच्छास्त्रविवेकतः पुनर्वैराग्ययुक्तेन विभाव्यमेतत् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले अपने अन्तःकरण से तत्त्व का स्वयं ही विचार करना
चाहिए, इसीसे वह आत्मवस्तु स्वयं प्राप्त की जा सकती है । इसके प्राप्त होने से पुरुष फिर शोक नहीं
करता । हे भरद्वाज, सत्संग और सत्-शास्त्र से प्राप्त विवेक से वैराग्ययुक्त होकर पुरुष को इसी तत्त्व
की बार-बार भावना करनी चाहिए