Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
नास्ति भिन्नं चितः किंचित्किं प्रपञ्चेन रुध्यसे ।
अभ्यासेन रहस्यानां वयस्य विशदो भव ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
मिथ्याभूत दवेत प्रप से वास्तव अद्वैत वस्तु की हानि नहीं होती, यह कहते हैं।
हे प्रियमित्र, असल में चैतन्य वस्तु से कुछ भी अलग नहीं है, अतः मिथ्या प्रपंच से किसका अवरोध
किया जा सकता हे । प्रणव, महावाक्य आदि जो मैं रहस्य तुमसे आगे जाकर प्रकट करनेवाला हूँ, उनके
अभ्यास से तुम अपने चित्त को विशुद्ध बना डालो