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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

सतां सत्कर्मसंवेगः पुराणं प्रणुदन्नयम् । वर्षौघ इव भूतानां दवानलमसेचयत् ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

अधिक पुण्य के द्वारा पूर्वजन्म के पापों का नाश होने पर शम, दम आदिरूप अमृत से शीतलता प्राप्त करनेवाले पुरूषो को आधिदैविक आदि तीनो तरह के तार्पो की शान्ति हो जाती है, इसे कहते हैं । रागादि दोषों से शून्य सज्जनं का यह सत्कर्मो का संवेग प्राणियों के पूर्वजन्म के पापों को नष्ट करता हुआ उनके त्रिविध तापों को ऐसे शान्त कर देता है, जैसे वर्षा का समूह दावानल को