Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 23–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 23,24
संस्कृत श्लोक
चित्तस्खलनभेदाली रागाद्याश्च प्रकल्पिताः ।
ममतोत्कलितावर्तः स्वतः स्वैरं प्रवर्तते ॥ २३ ॥
रागद्वेषावतिग्राहौ गृहीतसमनन्तरः ।
ततश्चानर्थपातालप्रवेशः केन वार्यते ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
छोटे-छोटे तरंगों को दशति हैं।
उन-उन विषयों में चित्त के गिरने के जो नानाविध प्रकार हैं, उनके हेतुभूत राग आदि दोष इस
समुद्र के छोटे-छोटे तरंग कल्पित किये गये है । ममता ही इसमें आवर्त है, यह यथेष्ट जहाँ चाहता है,
वहाँ प्रवृत्ति करने लग जाता है। इस समुद्र में राग और द्वेष बड़े-बड़े मगर हैं, उन्हीं दो मगरों से पहले
तत्काल ही तुम पकड़ लिये जाते हो ओर तदनन्तर अनर्थरूपी पाताल में तुम्हारा प्रवेश निश्चित हो
जाता है, यह प्रवेश किसी से भी रोका नहीं जा सकता