Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 3–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verses 3–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 3-6
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इति श्रुत्वा वसिष्ठस्य वाक्यं वेदान्तसंग्रहम् ।
विदिताखिलविज्ञानो रामः कमललोचनः ॥ ३ ॥
शक्तिपातवशोन्मेषप्रकटामलचिद्धनः ।
मुहूर्तमासीदुद्बुद्धश्चैतन्यानन्दसागरः ॥ ४ ॥
प्रश्नोत्तरविभागादिपरिपाटीविवर्जितः ।
आनन्दामृतपूर्णासू रोमकण्टकिताङ्गकः ॥ ५ ॥
महासामान्यरूपत्वाच्चिद्व्यापकतया स्थितः ।
नित्यमष्टगुणैश्वर्यतृणप्रायमनोरथः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
यों पूछे गये वाल्मीकिजी प्रश्न की द्वितीय कोटिका कथाशेष से समर्थन करते हुए उत्तर देते है।
वाल्मीकिजी ने कहा : भरद्वाज, समस्त वेदान्तशास्त्र का जिसमें संग्रह भरा था, ऐसे वसिष्ठमुनि के
पूर्वोक्त वचनं का श्रवणकर कमललोचन तथा अखिल विज्ञानं के ज्ञाता श्रीरामभद्र मुहूर्तपर्यन्त अपने
आत्मस्वरूप में जाग्रत ओर विकसित हो उठे । शक्तिपात के (0) प्रभाव से उनके अविद्या के पुट खुल
(79) "तत्त्वमसि" आदि उपनिषद् के महावाक्यों से उत्पन्न जो अखण्ड आकारवाली चित्त की
वृत्ति है, उसमें हुआ नित्य -निरतिशय आनन्दरूप आत्मतत्त्व का आविर्भाव ही यहाँ शक्तिपात" शब्द
का अर्थ समझना चाहिए । अथवा योगशास्त्र में वर्णित - सुषुम्ना के मार्ग में षट्चक्रं का भेदनकर
कुण्डलिनी का ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश होकर जो शिवशक्ति का संयोग होता है, यही संयोग “शक्तिपात”
गये ओर उनका निर्मल चैतन्य प्रकाशित हो उठा। उस समय वे अपने-आप प्रकाशित हो रहे आत्मानन्द
से पूर्ण हो गये थे। उस समय प्रश्न, उत्तर और विभाग (उक्त एवं अनुक्त अंश का विवेचन) आदि करने
की जो पद्धति होती है, इससे विरत हो गये थे । उनका चित्त आनन्दरूप अमृत से पूर्ण हो गया था।
उनके अंगों में रोमरूपी कण्टक हो गये थे । वे सर्वाधिष्ठान चैतन्यरूप बन गये थे, इससे वे चारों ओर से
परिपूर्ण होकर विराजित थे । अणिमा आदि आठ सिद्धियों की प्राप्ति करने की इच्छाएँ उनमें तृण के
तुल्य हो गयी थीं यानी उनका नामनिशान नहीं था । उन्होने उस समय वसिष्ठजी से कुछ भी नहीं
कहा । वे शिवपद में परिणत हो गये थे