Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 19–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verses 19–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 19-21
संस्कृत श्लोक
प्राङ्नास्ति चरमे नास्ति वस्तु सर्वमिदं सखे ।
विद्धि मध्येऽपि तन्नास्ति स्वप्नवृत्तमिदं जगत् ॥ १९ ॥
अविद्यायोनयो भेदाः सर्वेऽमी बुद्बुदा इव ।
क्षणमुद्भूय गच्छन्ति ज्ञानैकजलधौ लयम् ॥ २० ॥
सुशीतलोदकनदीं विदित्वाथ विगाह्य ताम् ।
बहिर्भ्रान्तिनिदाघास्ते निर्यान्तु कलितासुखम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जो वस्तु आदि और अन्तकाल मे नहीं रहती, वह मध्य में भी नहीं रह सकती, क्योंकि जिसका जो
स्वभाव होता है, वह किसी भी काल में बदल नहीं सकता । यह स्वप्न स्थल में सभी को ज्ञात है, इस
तरह की अनुमान शैली दशति हैं।
हे सखे, यह समस्त जगत् न तो आरम्भ में है और न अन्त में ही है। इसलिए तुम यह भी समझ लो
कि मध्य में भी यह है ही नहीं । इस जगत् का सारा वृत्तान्त ऐसा है, जैसा कि स्वप्न का है। अविद्या से
उत्पन्न हुए ये सारे भेद, जल में बुलबुलों की नाई, क्षण-क्षण में उत्पन्न हो होकर एकमात्र ज्ञानरूप
समुद्र मे विलीन हो जाते हैं। उत्तम शान्ति देनेवाली आत्मसंवित्तिरूपी नदी पहले जानकर फिर उसमें
गोता लगाकर वे बाह्मश्रान्तिरूप निदाघ (गर्मी के काल) सुखपूर्वक निकल जाय