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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । श्रीरामवृत्तान्तमशेषमादितो वसिष्ठवाक्यानुगतं निरूपितम् । धिया विचार्यानु परामृश प्रभो मयापि तादृक्कथनीयमत्र ते ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार पूछे गये वाल्मीकि मुनि 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्‌” न्याय से सिद्ध श्रुत ग्रन्थो की बार- बार आवृत्ति करना ही प्रथम उपाय है, यह उपदेश देते हैं। वाल्मीकि महाराज ने कहा : हे शिष्य आरम्भ से अन्त तक सम्पूर्णं रामवृत्तान्त, जो वसिष्ठजी के वाक्यो में रहा, मैंने तुमसे कहा | तुम अपनी बुद्धि से पहले विचार कर पीछे उसका अनुसन्धान करो मैं भी इस प्रसंग में तुमसे तुम्हारे अनुभव में उपयोगी जो तीन अवस्थाओं के विवेचन आदि वक्तव्य हैँ, उन्हें कहता हूँ, सुनो