Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
प्रशान्तामृतकल्लोले केवलामृतवारिधौ ।
मज्ज मज्जसि किं द्वैतग्रहक्षाराब्धिवीचिषु ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि तुम्हें समुद्र में ही ड्ूबना है, तो आनन्दसमुद्र में क्यो नहीं ड्बते, यह कहते हैं।
भद्र, (यदि तुम्हें समुद्र में डूबना ही है, तो) प्रशान्त तथा अमृतरूप तरंगों से पूर्ण केवल आनन्दामृत
के समुद्र में ही क्यों नहीं डूबते ? व्यर्थ द्वैतरूप मगरों से पूर्ण लवणसागर के तरंगों में क्यों डूबते हो ?