Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
एकश्चाज्ञानजलधिर्जगदाप्लाव्य तिष्ठति ।
ज्येष्ठोऽयमहमित्यूर्मिरविद्यावातसंभवः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अब वाल्मीकिजी अज्ञान का लवणसागर के रूप में वर्णन करते हैं।
अकेला अज्ञानरूपी समुद्र ही समस्त जगत् को व्याप्त कर स्थित हे । इस समुद्र में अनादि
भ्रान्तिवासनारूप वायु से उत्पन्न हुआ सबसे बड़ा यह “अहम् नाम का तरंग है