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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 91

31 verse-groups

  1. Verse 1नब्बेवाँ सर्ग मैत्री आदि गुणों से उपेत तथा निष्कल भाव को प्राप्त दो प्रकार के चित्त-नाश क…
  2. Verse 2श्रीरामजी ने कहा : भगवन्‌, आत्मा ओर अनात्मा के विचार से महामुनि वीतहव्य के बाधित हुए अन्त…
  3. Verse 3हे वाग्मियों के शिरोमणि, जब चित्त ब्रह्म में बाध हो गया, तब किसमें मत्री आदिगुण उत्पन्न ह…
  4. Verse 4महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, चित्त का विनाश दो प्रकार का होता है एक सरूप विनाश दूसरा अर…
  5. Verse 5इस संसार में चित्त का अस्तित्व (चित्तदर्शनपूर्वक आत्मा का अदर्शन) दुःख का कारण है ओर चित्…
  6. Verse 6तब किस तरह की चित्त सत्ता है 2 उसे कहते हैं। हे श्रीरामजी, जिसका बाध नहीं हुआ है, उस अज्ञ…
  7. Verse 7प्राक्तन अनादि अध्यास से सिद्ध देह, इन्द्रिय, विषय आदि के धर्मोमिं आत्मा के संसगध्यास से…
  8. Verse 8जब तक मन का अस्तित्व है, तब तक दुःख का विनाश कैसे ? जब मन अस्त हो जाता है, तब प्राणी का स…
  9. Verse 9हे श्रीरामचन्द्रजी, इस अज्ञानी जीव में ही वासनारूपी अकुरों के समूहों से दृढ़तापूर्वक प्रत…
  10. Verse 10श्रीरामजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, किस महात्मा का मन विनष्ट हुआ था ? विनाश को प्राप्त हुए मन क…
  11. Verse 11महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे प्रश्नवेत्ताओं में श्रेष्ठ रघुकुलवाहक श्रीरामजी, मैंने तामसेव…
  12. Verse 12हे श्रीरामजी, जैसे निःश्वास वायु पर्वतराज को अपने स्वरूप से विचलित नहीं करते, वैसे ही बाह…
  13. Verse 13“यह सात वित्ते का शरीर ही प्रसिद्ध मैं हूँ, यह उससे अतिरिक्त घट आदि सब मैं नहीं हूँ“, इस…
  14. Verse 14जिस नररत्न को आपत्ति, कार्पण्य यानी दरिद्रता, उत्साह यानी पुत्रादि प्राप्ति प्रयुक्त हर्ष…
  15. Verse 15लक्षण की उक्ति का उपसंहार करते हैं। हे साधो, इस लोक में यही चित्त का विनाश है और इसीको नष…
  16. Verse 16हे निष्पाप श्रीरामजी, मनस्ता (परमार्थरूपता की भ्रान्ति से घटादिदृश्य पदार्थो का मनन करना)…
  17. Verse 17हे राघव, उस विशुद्ध सत्स्वभावत्वरूप चित्त विनाश का, जो जीवन्मुक्त स्वभावात्मक है, किन्हीं…
  18. Verse 18हे पापशून्य रामजी, जीवन्मुक्त मन मत्री आदि शुभ गुणों से सम्पन्न उत्तम वासनाओं से युक्त तथ…
  19. Verse 19हे श्रीरामजी, ब्रह्माकार वासना से ओतप्रोत, पुनर्जन्म से निर्मुक्त जो जीवन्मुक्त मन की सत्…
  20. Verse 20भद्र, व्युत्थानकाल में ही प्रतिभासरूप से अनुभूत होने से मानों साकार स्वरूप को प्राप्त तथा…
  21. Verse 21इससे सत्ता नाशस्य कीदशी“ इस प्रश्ना का समाधान हआ, यह समझना चाहिए । इसीलिए मैत्री आदि गुणो…
  22. Verse 22संतोषरूपी शीतलता के आश्रय, सत््वनामक जीवन्मुक्तस्वरूप मनोनाश-दशा में गुणरूपी सम्पत्तियाँ…
  23. Verse 23दूसरे अरूप मनोनाश का दिग्दर्शन कराते हैं। हे रघुकुलभूषण, जो मेने पहले अरूप मनोनाश कहा था,…
  24. Verse 24श्रीरामजी, परम पवित्र विदेहमुक्तिरूपी निर्मल पद में समस्त श्रेष्ठ गुणों का आश्रय भी प्रात…
  25. Verse 25भद्र, विदेहमुक्त महात्माओं के प्राप्य विषय उस सत््वविनाशरूप अरूप चित्तनाश दशा में किसी भी…
  26. Verse 26कथित अर्थ का ही विस्तार करते है। वहाँ यानी अरूप चित्त विनाश दशा मेँ न मत्री आदि गुण है, न…
  27. Verse 27न तेज (मायिक सत्त्ववृत्ति) है, कुछ तम (मायिक तमोवृत्ति) है, न सन्ध्या है, न दिन है, न रात…
  28. Verse 28न कोई वासना है, न किरी प्रकार की रचना है, न इच्छा है, न अनिच्छा है, न राग है, न भाव है, अ…
  29. Verse 29वह परमपद तम ओर तेज से शून्य; तारे, चन्द्र, सूर्य ओर वायु से वर्जित; सन्ध्या, रजःकरण और सू…
  30. Verse 30जिस प्रकार वायु का विशाल आकाश प्रतिष्ठा स्थान है, वैसे ही वह विशाल पद उन लोगों का प्रतिष्…
  31. Verses 31–122विविध दुःख से निर्मुक्त, स्वयं चैतन्यरूप होता हुआ ही सुप्त पुरुष, की नाई उन्मेष आदि क्रिय…