Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
जरामरणपर्वायाः सुखदुःखफलावलेः ।
आरूढमूलमालाया मोहसेकजलाञ्जलेः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस
संसार में चित्त का अस्तित्व (चित्तदर्शनपूर्वक आत्मा का अदर्शन) दुःख का कारण है ओर चित्त का
विनाश (चित्तअदर्शनपूर्वक आत्मदर्शन) सुख का कारण है । अतः पहले चित्त की अस्तिता का विनाश
कर तदनन्तर चित्त का विनाश कर देना चाहिए