Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
जगत्काननमाक्रम्य स्थितायाः कृतजालकम् ।
ब्रह्मन्संसृतिमृद्वीकालताया वितताकृतेः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, चित्त का विनाश दो
प्रकार का होता है एक सरूप विनाश दूसरा अरूप विनाश, सारांश यह है कि स्फटिक आदि स्वच्छ
पदार्थो में पड़े हुए अपने प्रतिबिम्ब में जिस प्रकार अन्य पुरुष के भ्रम का आभास होता है, उस प्रकार
चित् में पड़े हुए चित्त प्रतिबिम्ब में चिदन्तरत्व (अन्य चित् का) का आभास होता है, उस भासमानरूप
से युक्त एक चित्तविनाश होता है ओर दूसरा तादृश रूप से शून्य चित्त विनाश होता हे । पहला सरूप
विनाश तो जीवनमुक्ति होने से होता है ओर दूसरा अरूप विनाश विदेहमुक्ति से हो जाता हे