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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

सप्ताब्धिवापीवलितं सरिच्छतमनोहरम् । चतुर्दशविधानन्तभूतजातोपजीवितम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे वाग्मियों के शिरोमणि, जब चित्त ब्रह्म में बाध हो गया, तब किसमें मत्री आदिगुण उत्पन्न होंगे और कहाँ वे प्रस्फुरित होगे, यह आप मुझसे कहिए । तात्पर्य यह है कि उस परिस्थिति में यह शंका होती है कि क्या जिसका बाध हुआ है, उसमें मेत्री आदि गुण उत्पन्न हुए ? या क्या जिस अधिष्ठान में बाध हुआ हे, उसमें मेत्री आदि गुण उत्पन्न हुए एवं उक्त गुण क्या चिदाभास में प्रस्फुरित होते हैं अथवा बिम्बभूत चैतन्य में ? इनमें से किसी भी पक्ष की उपपत्ति नहीं हो सकती । क्योकि बाधित मृगतृष्णा नदी में या उसके अधिष्ठान मरुभूमि में शेत्य आदि गुण उत्पन्न होते नहीं देखे जाते । इसी प्रकार वहाँ उनका भासक कोई पदार्थ भी उपलब्ध नहीं होता