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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

संविदुच्छूनतां चित्तं विद्धि तेनेदमाततम् । अनर्थजालमालूनविशीर्णजनजीवकम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, विदेहमुक्त महात्माओं के प्राप्य विषय उस सत््वविनाशरूप अरूप चित्तनाश दशा में किसी भी दृश्य पदार्थ का अस्तित्व नहीं रहता, क्योकि “यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा" (जिस परब्रह्म पद की प्राप्ति-दशा में न दूसरा दिखाई पडता है, न दूसरा सुनाई पडता है, न दूसरा ज्ञात होता है, वह भूमा है) इत्यादि श्रुति हे