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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

यथा गन्धर्वसंकल्पात्पुरमेवं हि चेतसः । सवातायनमाकारभासुरं जायते वपुः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, जैसे निःश्वास वायु पर्वतराज को अपने स्वरूप से विचलित नहीं करते, वैसे ही बाह्य और आभ्यन्तर सुख-दुःख दशाएँ जिस धीर पुरुष को सम-स्वभाव तथा पूणनिन्दैकरस स्वात्मनिष्ठा से विचलित नहीं करती, विद्वान्‌ लोग उस महात्मा के चित्त को नष्ट चित्त कहते हैं