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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 87

पचासीवाँ सर्ग समाप्त छियासीवाँ सर्ग मुनि वीतहव्य की छः रात्रि तक पुनः समाधि, चिरकाल तक जीवनमुक्त स्थिति, राग आदि को तिलांजलि और मुक्ति में समाधि का वर्णन ।

55 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, दिन की समाप्ति के बाद उक्त मुनि ने पुनः भी मन की एकाग्रतार…
  2. Verse 2लोक में क्या सार है और क्या असार है , इसका भली प्रकार परिज्ञान रखनेवाले महामुनि वीतहव्य उ…
  3. Verse 3उन्होने क्या विचार किया ? उसे कहते है। मैंने पहले से ही इन्द्रियों का भली प्रकार परित्याग…
  4. Verse 4अस्ति ओर नास्ति यों दो प्रकार दृश्य कल्पनाओं का, कोमल लता की नाई, विनाश कर उन दो कल्पनाओं…
  5. Verse 5मैं यद्यपि सदा उदित स्वभाव (प्रकाश स्वभाव) हूँ, तथापि अज्ञ दृष्टि से अन्धकार को प्राप्त ह…
  6. Verse 6मैं यद्यपि प्रबुद्ध यानी उत्तमज्ञान से सम्पन्न जाग्रत्‌ अवस्था से युक्त हूँ, तथापि सुषुप्…
  7. Verse 7मन से परे यानी मन के अविषय चारों ओर अवस्थित, पूर्ण सत्तासामान्यरूप परम साम्यभूत परमात्मा…
  8. Verse 8इस प्रकार विचार कर वह ध्यान में छः दिन तक फिर बैठ गये । तदनन्तर उस प्रकार प्रबोध को प्राप…
  9. Verse 9तदनन्तर उस समय व्युत्थान दशा मेँ भी समाहित स्थितिवाले सिद्ध, महान्‌ तपस्वी, भगवान्‌ वीतहव…
  10. Verse 10ये महामुनि वीतहव्य न तो गुण दृष्टि से किसी वस्तु की स्तुति करते थे ओर न दोषदुष्टि से किसी…
  11. Verse 11चलते-फिरते उठते-वैठते चित्त से शून्य हुए उस वीतहव्य मुनि के हृदय में अपने मन के (बाधित-अन…
  12. Verse 12विषयों के उपभोग से सामर्थ्य के व्यय से रहित, इन्द्रियों के स्वामी हे मन, देखो कि शम से सम…
  13. Verse 13सर्वश्रेष्ठ मन, इसलिए तुमको आगे भी इस रागशून्य दशा का ही अवलम्बन करना चाहिए और अपनी चंचल…
  14. Verse 14हे इन्द्रिय नाम को धारण करनेवाले चोर और हे नष्ट आशावृन्द, यह मेरे द्वारा अनुभूयमान आत्मा…
  15. Verse 15हे इन्द्रियगण, इस प्रकार आत्मा के साथ सम्बन्ध न होने के कारण अब तुम लोग अवशिष्ट अपने असत्…
  16. Verse 16तब पहले हम लोगों में तुम्हारे ऊपर आक्रमण करने की सामर्थ्य कहाँ से थी ? तो आत्मा के साथ ता…
  17. Verse 17उक्त यह वासना अनात्मा में आत्मत्वरूपा भ्रान्ति ओर वस्तु में अवस्तुत्वरूपा भ्रान्ति थी । व…
  18. Verse 18इस प्रकार विवेकज्ञान हो जाने पर किसी को भी आपके द्वारा उत्पन्न दोषो के साथ सम्बन्ध नहीं ह…
  19. Verse 19यदि ऐसी बात है, तो व्यवहाररूपी कार्य की सिद्धि किस रीति से होगी ? तो काकतालीय न्याय से हो…
  20. Verses 20–21यों इस लोक में अपने-अपने भिन्न-भिन्न प्रयोजन के लिए अवस्थित पदार्थों की यानी क्रिया-कारकर…
  21. Verse 22अब अविद्या दूर से ही विस्मृत हो गई, आत्मविद्या विस्पष्टरूप से अनुभूत हो गई, जो सत्‌ था वह…
  22. Verse 23हे श्रीरामजी, इस प्रकार के विचार से युक्त होकर उन महान्‌ तपस्वी मुनि श्रेष्ठ भगवान वीतहव्…
  23. Verse 24श्रीरामजी जिस पद के प्राप्त होने पर पुनर्जन्म के लिए चिन्ता विनष्ट हो जाती है ओर मूढता को…
  24. Verse 25किसी समय भ्रान्त से चित्र-विचित्र पदार्थो के समूह के दर्शन से प्राप्त हुए यथास्थित आत्मभू…
  25. Verse 26शेष प्रारन्ध का विनाश हो जाने पर मुनि वीतहव्य का मन किस प्रकार का रहा, उसे कहते हैं। त्या…
  26. Verse 27देहापगम दशा में एक अद्वितीय रूप से स्थित, जन्म ओर कर्मो की अवधि के अवसानरूप तथा प्रतिभासम…
  27. Verse 28फिर देह आदि के साथ संगति न हो, इसलिए शीघ्र जगत्रूपी जाल का भली प्रकार अवलोकन कर वे महामुन…
  28. Verse 29स्वाभाविक शत्ुभूत राग, द्वेष आदि में भी दवेषअमावरूपता और मैत्री की भावना करते हुए मोक्षपद…
  29. Verses 30–31हे भोग, मैं आप लोगों को प्रणाम करताहू। आप लोगों ने मेरा इस लोक में सौ करोड़ों वर्ष तक उस…
  30. Verse 32सबसे पुण्यतम इस मोक्षपद का भी जिसने मुझको विस्मरण कराया था, उस अंशरूप विषयसुख को मेँ बार-…
  31. Verse 33हे दुःख के तत््वभूत सुखद आत्मन्‌, तुम्हारी ही अनुकम्पा से मैंने यह अत्यन्त शीतल पदवी (निर…
  32. Verse 34अब ज्ञान के प्रादुभावि मेँ उपकारक देह की प्रार्थना कर उसको संबोधित करते है । संसार में सा…
  33. Verse 35आश्चर्य है कि प्राणियों के स्वार्थो की अत्यन्त विषम गति हे, क्योकि वस्तु की प्राप्ति के ल…
  34. Verse 36हे मित्र देह, चिरकाल से बन्धुरूप तुम मेरे द्वारा जो त्यागे जा रहे हो वह एक स्वार्थ की ही…
  35. Verses 37–38तुमने आत्मा के विज्ञान की प्राप्ति कर अपना विनाश किया है, अतः हे देह, तुम्हारे द्वारा ही…
  36. Verse 39अब तृष्णा की प्रार्थना करते हैं। हे मातृरूप तृष्णे, मैं अब जा रहा हूँ। मेरे जाने पर तुम अ…
  37. Verse 40अब फिर पुनरावृत्ति के द्वारा तृष्णा के मुख का दर्शन न हो, इसलिए उसका निवारण कर रहे मुनि व…
  38. Verse 41हे पुण्यदेव, आपको मैं प्रणाम करता हूँ, आप ही ने पहले मेरा नरकों से उद्धार कर स्वर्ग के सा…
  39. Verse 42निषिद्ध आचरणरूपी खेत में उत्पन्न हुए, नरकरूपी बड़ी-बड़ी शाखाओं को धारण करनेवाले और यातनार…
  40. Verse 43जिसके साथ मैंने दीर्घकाल तक प्रकृत योनियों का उपभोग किया था, आज तक प्रत्यक्ष नहीं हुए उस…
  41. Verse 44शब्द कर रहे बाँस जिसके मधुर शब्द हैं और शीर्ण पत्ते ही जिसके पहनने के लिए वस्त्र हैं, समा…
  42. Verse 45हे सखी गुहातपस्विनि, संसाररूपी महामार्ग में खिन्न हुए मेरे लिए तुम ही अकेली आश्वासन देने…
  43. Verse 46अनेक दुःखों से खिन्न तथा दोषों से (समाधि के विघ्नो से) द्रवीभूत हुए मैंने शोक का विनाश कर…
  44. Verse 47अब दण्डकाष्ठ के गुणोका वर्णन कर उसको नमस्कार करते है । कुत्ते, सर्प आदि से होनेवाले भयो म…
  45. Verse 48अब सम्पूर्ण वेहभाग देह को ही समर्पण करते है। हे देह, के अस्थिपंजर ओर दूसरा रक्त तथा आँतरू…
  46. Verse 49हे देह, तुम्हारे मल, दुर्गध, स्वेद आदि के द्वारा दूषित हो जाने के कारण हुए जो जलके अपराध…
  47. Verse 50हे पुराने सजग मित्ररूप प्राण, आज भने मित्रों की नमस्कार-परम्परा में आप लागों को भी ऊँचा ब…
  48. Verse 51पहले के मित्र भाव का वर्णन करते हैं। हे प्राणवृन्द, आप लोगों के साथ मैंने चित्र-विचित्र अ…
  49. Verse 52आप लोगों के साथ ही मैंने नगरों में और सिद्धों के क्षेत्रों में क्रीडा की, पर्वतों में निव…
  50. Verse 53हे प्राणवृन्द, संसार के कोश में ऐसा कोई भी नहीं है, जिसको आप लोगों के साथ मैंने अपने हाथो…
  51. Verses 54–55हे प्रिय प्राण-समुदाय, आप अपनी प्रकृति मे जाइये और मैं ब्रह्म में जाता हूँ, आप लोग यह शंक…
  52. Verse 56अब प्रत्येक इन्द्रिय आदि के द्वारा प्राप्त करने योग्य प्रकृति को विभागपूर्वक बतलाते हैं।…
  53. Verse 57शब्दों की श्रवणशक्ति यानी श्रोत्रेन्द्रिय आकाश कुक्षि में प्रविष्ट हो जाय ओर रसना की रसग्…
  54. Verses 58–59उस प्रकार उपाधिभूत आप लोगों के अपनी-अपनी प्रकृतियों में प्रविष्ट हो जाने पर आपे प्रतिबिम्…
  55. Verse 60सम्पूर्ण कार्यो की परम्परा से शून्य,समस्त दृश्यों की अवस्था को अतिक्रमण कर स्थिति रखनेवाल…