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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 29

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

स्वाभाविक शत्ुभूत राग, द्वेष आदि में भी दवेषअमावरूपता और मैत्री की भावना करते हुए मोक्षपद को जानने की इच्छावाले- से होकर हित का उपदेश कर रहे प्रणाम करके उनको संबोधित करते हैं : हे राग, अब तुम नीरागस्वरूप हो जाओ । हे द्वेष, तुम द्रेषअभावरूप हो जाओ । आप दोनों ने इस लोक में मेरे साथ दीर्घकाल तक क्रीडा की है