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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

यच्छून्यवादिनां शून्यं ब्रह्म ब्रह्मविदां वरम् । विज्ञानमात्रं विज्ञानविदां यदमलं पदम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार विवेकज्ञान हो जाने पर किसी को भी आपके द्वारा उत्पन्न दोषो के साथ सम्बन्ध नहीं होता, ऐसा कहते है । हे इन्द्रिय गण, करणस्वरूप आप लोग दूसरे हँ, अभिमान करनेवाले हम लोग दूसरे हैं, अद्वितीय ब्रह्म दूसरा है , प्राण हेतुक क्रिया कारणता दूसरी हे, चिदाभासरूपी भोक्ता दूसरा है ओर ग्रहण करनेवाला मन दूसरा है, ऐसी स्थिति में किस का किस प्रकार कौन-सा दोष हो सकता है ?