Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
निरानन्दोऽपि सानन्दः सच्चासच्चापि तत्र सः ।
आसीन्न किंचित्किंचित्तत्प्रकाशस्तिमिरं यथा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
इन्द्रियगण, इस प्रकार आत्मा के साथ सम्बन्ध न होने के कारण अब तुम लोग अवशिष्ट अपने असत्त्व
स्वरूप को ही प्राप्त हो जाओ। तुम्हारी समग्र अभिलाषाएँ निष्फल कर दी गई है। अब विनष्ट आश्रयवाले
तुम लोग मेरे ऊपर आक्रमण करने में समर्थ नहीं हो