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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

शान्ततेजस्तमःपुञ्जं विगतार्केन्दुतारकम् । अधूमाभ्ररजःस्वच्छमनन्तं शरदीव खम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं यद्यपि प्रबुद्ध यानी उत्तमज्ञान से सम्पन्न जाग्रत्‌ अवस्था से युक्त हूँ, तथापि सुषुप्ति में ही स्थित रहता हूँ । क्योकि घट आदि द्वैत पदार्थो को अव मैं नहीं देख रहा हू । इसी प्रकार यद्यपि मैं सुषुप्ति में स्थित रहता हूँ । तथापि जाग्रत्‌ अवस्था से युक्त ही हूँ, क्योकि मुञ्चे अपने स्वरूप का सदा स्पष्टरूप से अनुभव हो रहा हे । स्थूल, सूक्ष्म और कारण से निर्मुक्त तुर्य पद का अवलम्बन कर अचल स्थितिवाला होकर शरीर के भीतर रहता हूँ