Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
मात्रादिपादभेदेन प्रणवं संस्मरन्यतिः ।
अध्यारोपापवादेन स्वरूपं शुद्धमव्ययम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
लोक में क्या
सार है और क्या असार है , इसका भली प्रकार परिज्ञान रखनेवाले महामुनि वीतहव्य उसी आत्मा के
अनुसन्धान का परित्याग न करते हुए इन्द्रियों के साथ अन्तःकरण से विचारने लगे