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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verses 54–55

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, verses 54–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 54,55

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

हे प्रिय प्राण-समुदाय, आप अपनी प्रकृति मे जाइये और मैं ब्रह्म में जाता हूँ, आप लोग यह शंका न करें कि हम लोगों का प्रकृति में प्रविलाप क्यों कराते हैं ? कार्यकरणसंघातरूप से ही स्थित होकर भोग्यसमुदाय को ही पहले के समान प्राप्त किये जाय, क्योंकि जितने भोग्य समूह हैं, वे अन्त में नाशवान हैं, और जितने उन्नत हैं, वे अन्त में पतनशील हैँ । संसार- मार्ग में जितने संयोग है वे सब अन्त में वियोग को ही प्राप्त होते हें