Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवं कलितवानन्तः प्रशान्तमननैषणः ।
शनैरुच्चारयंस्तारं प्रणवं प्राप्तभूमिकः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, दिन की समाप्ति के बाद उक्त मुनि ने पुनः भी मन की एकाग्रतारूप
समाधि के लिए किसी अतिविस्तृत पूर्वपरिचित विन्ध्याद्रि की गुफा में प्रवेश किया
सर्ग सन्दर्भ
पचासीवाँ सर्ग समाप्त छियासीवाँ सर्ग मुनि वीतहव्य की छः रात्रि तक पुनः समाधि, चिरकाल तक जीवनमुक्त स्थिति, राग आदि को तिलांजलि और मुक्ति में समाधि का वर्णन ।