Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 27
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
देहापगम दशा में एक अद्वितीय रूप से स्थित, जन्म ओर कर्मो की अवधि के अवसानरूप
तथा प्रतिभासमात्र से भी अवस्थित देह आदि संसार के संग का त्याग हो जाने पर परिशेष में रहनेवाली
ब्रह्मरसरूपी मकरन्द में उनको उत्कण्ठा हुई और उसके बाद उन्होंने उसी इच्छा के साथ सह्य पर्वत की
सुवर्णकन्दरा में प्रवेश किया