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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 64

तिरसठवाँ सर्ग समाप्त चौसठवाँ सर्ग उपायों का परिज्ञान रखनेवाला पुरुष जिन उपायों द्वारा मानस दोषों से विचलित नहीं होता ओर अपनी आत्मा का संसार दुःख से उद्धार करता है, उन उपायों का कथन |

39 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठ महाराज ने कहा : भद्र श्रीरामजी, तत्त्वज्ञ सुरघु और राजा परिघ दोनों पूर्व वर्णि…
  2. Verse 2हे राघव, उस वर्णन किये गये संवादरूपी उत्तम बोध-हेतु का श्रवण कर किया गया निश्चय ही बोध के…
  3. Verses 3–6पण्डितो के साथ विचार करने के कारण या अपने निश्चल विचार के कारण अत्यन्त तीव्र हुई उत्तम प्…
  4. Verse 7रामजी, जैसे जल में रहनेवाला कमल कीचड़ आदि कलंकों से कलंकित नहीं होता, वैसे ही तत्त्वज्ञ व…
  5. Verse 8जैसे हाथियों से सिंह पराभव को प्राप्त नहीं होता, वैसे ही जो सम्यक्‌ ज्ञान से युक्त, निर्म…
  6. Verse 9जैसे नन्दनवन में विषैले काँटों से युक्त वृक्ष नहीं होते, वैसे ही ज्ञानी पुरुष का केवल विष…
  7. Verse 10जैसे विरक्तपुरुष, कामुकपुरुष के समान पत्नी आदि का मरण होने पर दुःखी नहीं होता, वैसे ही जि…
  8. Verse 11विज्ञाता पुरुष को भावी दुःखो के हेतु पापों का भी सम्बन्ध नहीं होता, यह कहते है । हे साधो,…
  9. Verse 12हे श्रीरामजी, जैसे अन्धकाररूपी रोग का महान्‌ ओषध दीपक है, वैसे ही जगदाकार में फैले हुए इस…
  10. Verse 13जैसे यह स्वप्न है, इस प्रकार जाने गये स्वप्न से स्वाप्निक भोग भूमि का सदा सर्वदा के लिए व…
  11. Verse 14जैसे जल मछलियों के नेत्रों को स्पर्श नहीं करता (यदि जल मछलियों के नेत्रों को स्पर्श करेगा…
  12. Verse 15हे श्रीरामजी, दैदीप्यमान चिद्रूपी प्रकाश का उदय हो जाने पर अज्ञानरूपी रात्रि सदा के लिए व…
  13. Verse 16शास्त्ररूपी सूर्य से बोधित हुआ पुरुष अज्ञानरूपी निद्रा का विनाश होने के बाद उस विज्ञान को…
  14. Verse 17अब विद्या की स्तुति करते हैं। वे ही दिन जीवनपूर्ण हैं और वे ही क्रियाएँ आनन्द से युक्त है…
  15. Verse 18जैसे चन्द्रमा अपने अमृत से भीतर शीतलता को प्राप्त करता है, वैसे ही मोह का अतिक्रमण कर लेन…
  16. Verse 19वे ही मित्र मित्र है, वे ही शास्त्र शास्त्र हैं और वे ही दिन दिन हैं, जिनके कारण वैराग्यर…
  17. Verse 20पाप के विनाश से वर्जित अतएव जिन मनुष्यों की आत्मा को जानने में उपेक्षा हें वे जन्मरूपी जं…
  18. Verses 21–29हे श्रीरामजी, विषयाभिलाषारूपी सैकड़ों बन्धं से वैधे, भोगरूपी तिनको में अत्यन्त लालच कर रह…
  19. Verse 30उद्धार कर चुकने पर जीव के फिर कीचड़ में फंसने की शंका का निवारण करते है । हे रघुवीर, तत्त…
  20. Verse 31उद्धार के उपायों का ज्ञान तो सद्‌युरुओं के समीप जाने से मिलता है, इस आशय से कहते हैं। हे…
  21. Verses 32–34हे श्रीरामजी, मरुभूमि की नाईं जिस भूमि में मोक्षरूपी फल को देनेवाला और मानसिक शान्तिरूपी…
  22. Verse 35श्रीरामचन्द्रजी, मनोहर और तापोपशामक शीतलवचन ही जिसके पत्ते हैं, परोपकार परायणता ही जिसकी…
  23. Verse 36बुद्धिमान्‌ व्यक्तियों को अपनी बुद्धि, शास्त्र और सज्जनों की सहायता लेकर प्रबल प्रयत्न से…
  24. Verse 37अज्ञान में डूबी हुई अपनी आत्मा का उद्धार करने में मनुष्यों को धन, मित्र, अनात्मशास्त्र ओर…
  25. Verse 38तब कौन उपकार करता है, इस प्रश्न पर कहते हैं। सदा सर्वदा ही साथ रहनेवाले विशुद्धमनरूपी मित…
  26. Verses 39–40वैराग्य ओर अभ्यासरूपी प्रयत्नों के द्वारा किये गये आत्मविचार से उत्पन्न आत्मतत्त्व साक्षा…
  27. Verse 41अनेक मनुष्यों के द्वारा प्रतिदिन शोक को प्राप्त हो रहे तथा दुष्ट आशाओं के द्वारा दाह को प…
  28. Verses 42–43हे श्रीरामचन्द्रजी, इस आत्मा की इतने ही यत्न से रक्षा की जा सकती है, जितने यत्न से अपने अ…
  29. Verse 44मन के द्वारा रची गई बाह्य और आध्यात्मिक आसक्तियों का निरसन कर जो अहंकारभाव काट दिया जाता…
  30. Verse 45अहंकाररूपी मेघ के विनष्ट हो जाने पर पहले चैतन्यरूपी सूर्य दिखाई देता है, तदनन्तर उस परमात…
  31. Verse 46जैसे अन्धकार का उच्छेद हो जाने पर प्रकाश का परिज्ञान स्वतः हो जाता है, वैसे ही अहंकार का…
  32. Verse 47अहंकार के विनष्ट हो जाने पर जो निरतिशयानन्द विश्रान्ति की स्वरूपभूत निर्विकल्प अवस्था आवि…
  33. Verse 48उसी निर्विकल्प अवस्था का वर्णन करते हैं। परिपूर्ण समुद्र की तरह असीम वह निर्विकल्प अवस्था…
  34. Verse 49यदि चेतन के प्रकाशात्मक अंश से गृहीत स्थिरता को प्राप्त तुरीय दृष्टि प्राप्त हो, तो उसी त…
  35. Verse 50किस तरीके से तु्यावस्था की संभावना होगी ? तो इस पर कहते हैं। तुर्यावस्था में स्थित निर्वि…
  36. Verses 51–52घट का विनाश होने पर जैसे घटाकाश महाकाशस्वरूप हो जाता है, वैसे ही मन, अहंकार आदि उपाधियों…
  37. Verse 53जैसे साधारण खांड आदि के स्वरूप का अपने अनुभव के सिवा ओर किसी दूसरे प्रमाण से परिज्ञान नही…
  38. Verse 54यह सब सर्वव्यापक आत्मस्वरूप ही है। यदि यह सब आत्माका ही स्वरूप है, तो उसका किस तरह अनुभव…
  39. Verse 55उस प्रकार चतुर्थ भूमिका में आत्मा का अनुभव होने के अनन्तर पाँचवी भूमिका में विषयवासनाओं क…