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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verses 21–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, verses 21–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 21-29

संस्कृत श्लोक

आशापाशशतैर्बद्धं भोगोलपसुलालसम् । जराजर्जरिताकारं शोकोच्छ्वासकदर्थितम् ॥ २१ ॥ व्यूढदुःखमहाभारं जन्मजङ्गलजीवितम् । कुकर्मकर्दमालिप्तं मोहपल्वलशायिनम् ॥ २२ ॥ रागदंशावलीदष्टं कृष्टं तृष्णावरत्रया । मनोवणिङनिकेतस्थं बन्धुबन्धननिश्चलम् ॥ २३ ॥ पुत्रदारजराजीर्णे मग्नोन्मग्नं कुकर्दमे । श्रान्तं विगतविश्रामं भग्नमादीर्घवर्त्मनि ॥ २४ ॥ गमागमपरिक्षीणं संसारारण्यचारिणम् । अलब्धशीतलच्छायं तीव्रतापोपतापितम् ॥ २५ ॥ आकारभासुरं दीनं बाह्यैराक्रान्तमिन्द्रियैः । कर्मघण्टारवाक्रान्तं क्रान्तं दुष्कृतताडनैः ॥ २६ ॥ आविर्भावतिरोभावचक्रावर्तधुरोद्वहम् । अज्ञानविकटाटव्यां लुठितं सन्नगात्रकम् ॥ २७ ॥ निजानर्थसदामग्नं सीदमानमकिंचनम् । सन्नाङ्गं कर्मभारेण करुणाक्रन्दकारिणम् ॥ २८ ॥ राम जीवबलीवर्दमिमं संसारपल्वलात् । परमं यत्नमास्थाय चिरमुत्तारयेद्वलात् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, विषयाभिलाषारूपी सैकड़ों बन्धं से वैधे, भोगरूपी तिनको में अत्यन्त लालच कर रहे, बुढ़ापे के कारण जर्जर आकार को प्राप्त हुए, शोकजनित उच्छवास से विडम्बित हो रहे; दुःखरूपी भारी बोझ को ढो रहे, जन्मरूपी जंगल में जी रहे, कुकर्मरूपी कीचड़ से चारों ओर चुपड़े गये, मोहरूपी स्वल्प जलाशय में सो रहे; रागरूपी दाँतों की पंक्तियों से चवाये गये, तृष्णारूपी चर्ममयी नासारज्जू से (नाथ से) खींचे गये, मनरूपी बनिये की आज्ञा में स्थित रहे, बान्धवरूपी बन्धनो के कारण चलने फिरने मेँ अशक्त हुए; पुत्र ओर स्त्री की शिथिलता से जनित जीर्णतारूपी गोबर में बार-बार डूब रहे, सदा थके हुए, विश्रान्ति से वर्जित, आवागमन के दीर्घ मार्गो मेँ भग्न; आवागमन के कारण चारों ओर से क्षीण, संसाररूपी अरण्य मे चक्कर काट रहे, शीतल छाया को प्राप्त नहीं हुए, तीव्र विषय संसर्ग जन्य तापो से संतापितः केवल बाहरी आकार से सुन्दर पर भीतर से दीन, बाह्यचक्षु आदि इन्द्रियों से प्रभावित, काम्य कर्मों में रुचि बढ़ानेवाले अर्थवादरूपी घण्टानादों से भ्रमित, पापरूपी कोड़ों के आघातों से पीड़ित; जन्म- मरणरूपी गाड़ी के बोझ से लदे हुए, अज्ञानरूप विकट अटवी में लुठित अतएव भग्न-शरीर; अपने अनर्थ में ही सर्वदा निमग्न, दुःखी, दीन, जडीभूत शरीर, कर्मों के बोझ से सदा करुण क्रन्दन कर रहे इस जीवरूपी बैल का संसाररूपी स्वल्प तालाब से दीर्घकाल तक उत्तम प्रयत्न करके ज्ञानरूपी बल से उद्धार करना चाहिए