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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । सुरघुः परिघश्चैव विचार्येति जगद्भ्रमम् । मिथः प्रपूजितौ तुष्टौ स्वव्यापारपरौ गतौ ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठ महाराज ने कहा : भद्र श्रीरामजी, तत्त्वज्ञ सुरघु और राजा परिघ दोनों पूर्व वर्णित प्रकार से जगत्‌-विभ्रम का विचार कर अत्यन्त प्रसन्न हुए, उन्होने परस्पर एक दूसरे का विशिष्ट पूजन किया ओर अपने-अपने कार्यो में तत्पर हो यथा स्थान प्रस्थान किया

सर्ग सन्दर्भ

तिरसठवाँ सर्ग समाप्त चौसठवाँ सर्ग उपायों का परिज्ञान रखनेवाला पुरुष जिन उपायों द्वारा मानस दोषों से विचलित नहीं होता ओर अपनी आत्मा का संसार दुःख से उद्धार करता है, उन उपायों का कथन |