Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
अयमेतावतैवात्मा त्रातो भवति राघव ।
यदपास्य विमूढत्वमहंकारः प्रमार्ज्यते ॥ ४२ ॥
एतावतैव सन्मार्गे याति प्रकटतामलम् ।
यदपास्य मनोजालमहंभावो विलूयते ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस आत्मा की इतने ही यत्न से रक्षा की जा सकती
है, जितने यत्न से अपने अज्ञान को दूर कर अहंकार निकाल दिया जाय