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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verse 41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

अहंकारमहालानं तृष्णारज्जुं मनोमदम् । जन्मजम्बालनिर्मग्नं जीवदन्तिनमुद्धरेत् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

अनेक मनुष्यों के द्वारा प्रतिदिन शोक को प्राप्त हो रहे तथा दुष्ट आशाओं के द्वारा दाह को प्राप्त हो रहे आत्मा की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, किन्तु अत्यन्त आदर से इसका उद्धार करना चाहिए॥४ ०॥ अहंकार ही जिसका मजबूत आलान (हाथी बोधने का खूँटा) है, तृष्णा ही जिसको बाँधने की रस्सी है, मन ही गण्डस्थल से झरनेवाला जिसका मद है और जन्मरूप कीचड़ में जो फँस गया है, ऐसे जीवरूपी हाथी का उद्धार करना चाहिए