Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verses 3–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, verses 3–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 3-6
संस्कृत श्लोक
परया प्रज्ञया धीरविचारगततीक्ष्णया ।
गलत्यलमहंकारकालमेघे हृदम्बरे ॥ ३ ॥
समस्तलोकानुमते सफले ह्लादकारिणि ।
निर्मले वितते चेतः शरत्काल उपस्थिते ॥ ४ ॥
ध्येये शरण्ये सुगमे सकलानन्दसंपदि ।
सुप्रसन्ने चिदाकाशे स्थीयते परमात्मनि ॥ ५ ॥
यो नित्यमध्यात्ममयो नित्यमन्तर्मुखः सुखी ।
नित्यं चिदनुसंधानो मनःशोकैर्न बाध्यते ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
पण्डितो के साथ
विचार करने के कारण या अपने निश्चल विचार के कारण अत्यन्त तीव्र हुई उत्तम प्रज्ञा से हृदयाकाश में
अहंकाररूपी काले मेघ के निःशेष गल जाने पर; समस्त लोगों से अनुमोदित, फलात्मक बोध से युक्त
(शरत्-पक्ष मे सस्यादि फलों से युक्त), अतएव प्रसन्नता बढानेवाले, राग आदि मलों से रहित (शरत्-
पक्ष में पंक आदि मलों से शून्य), विस्तृत चित्तरूपी शरत्काल के उपस्थित होने पर; जो ध्यान करने
योग्य, समग्र अनर्थो के नाशक, आत्मरूपता के कारण सुगम, सम्पूर्ण आनन्दं की निधि, अत्यन्त
प्रसन्न परमात्मारूपी चिदाकाश मेँ अवस्थित रहता है ओर जो सदा केवल आत्मा के विचार में निरत,
सदा बाह्य आसक्ति से शून्य, सुखी तथा पुनःपुनः आदर से केवल चिन्मात्र वस्तु में आस्वाद लेनेवाला
है, वह मानसिक शोको से कभी विचलित नहीं होता