Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
अखिलमिदमनन्तमात्मतत्त्वं दृढपरिणामिनि चेतसि स्थितेऽन्तः ।
बहिरुपशमिते चराचरात्मा स्वयमनुभूयत एव देवदेवः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
यह सब सर्वव्यापक आत्मस्वरूप ही है। यदि यह सब आत्माका ही स्वरूप है, तो उसका किस तरह
अनुभव होता है ? इस प्रश्न पर कहते हैं।
जब चित्त बाह्य विषयों से उपरत हो जाता है ओर प्रत्यगात्मा मेँ क्षीरोदक के समान एकरसरूप से
उसका निश्चल परिणाम हो जाता है, तब चर और अचरों के स्वरूपभूत तथा चक्षु आदि इन्द्रियों का
साक्षीरूप से प्रकाश करनेवाला आत्मा स्वयं ही अनुभूत हो जाता है, इस विषय में तनिक भी संशय नहीं
करना चाहिए