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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 38

सैंतीसवाँ सर्ग समाप्त अड़तीसवाँ सर्ग असंग आत्मा को जो नहीं जानता, उसके मन के संग से कर्तृत्व तथा आत्मतत््वज्ञानी के अकर्ता ओर अभोक्ता होने से बन्ध के अभाव का वर्णन ।

22 verse-groups

  1. Verse 1यदि कोई शंका करे कि तत्त्वज्ञानिर्यो की भी लौकिक और शास्त्रीय कर्मों में कर्तुता देखी जात…
  2. Verse 2पहले विचार करना चाहिये कि कर्तृत्व किसे कहते हैं । शारीरिक क्रिया तो कर्तृत्व है नहीं, क्…
  3. Verse 3चेष्टावश वासनानुरूप फलभोक्तृत्व होता है, क्योंकि वासना के अनुसार ही पुरुष चेष्टा करता है…
  4. Verse 4उक्त अर्थ में श्लोक को उद्धृत करते हैँ । कहा भी है : पुरुष चाहे कार्य करे या न करे फिर भी…
  5. Verse 5भले ही वासना ही कर्तृता और भोक्तृता हो, फिर भी ज्ञानी ओर अज्ञानी के अन्तर की सिद्धि कैसे…
  6. Verse 6ज्ञानी में जो विशेषता पहले कही गई थी, उसीका उपपादन करते हैं। जिस पुरुष को तत्त्व का परिज्…
  7. Verse 7मन जो करता है, वही कृत होता है । जो नहीं करता, वह कृत नहीं होता, इसलिए मन ही कर्ता है, दे…
  8. Verse 8चित्त से ही यह संसार प्राप्त हुआ हे, अतएव यह चित्तमय ही हे । चित्तमय क्यों ? बल्कि केवल च…
  9. Verse 9उन जीवों में आत्मज्ञानियों का वह मन वर्षा ऋतु में मृग तृष्णा के जल की तरह विनष्ट होकर एवं…
  10. Verse 10पूर्वोक्त मन की दशा का वर्णन करनेवाले श्लोक को उद्धृत करते है । विद्वान लोग ज्ञानियों के…
  11. Verse 11ज्ञानी और अज्ञानियो की दूसरी विशेषता भी कहते है। ज्ञानी पुरुष जैसे हाथी छोटी तलेया में नह…
  12. Verse 12अज्ञानी के मन के दु्वासना दुःख में मग्न होने में स्वप्न दृष्टान्त है, एेसा कहकर उसका उपपा…
  13. Verse 13इसलिए चाहे आप कर्म कीजिये या न कीजिये। आपका चित्त कर्मो मे सदा आसक्तिरहित हो । आत्मतत्त्व…
  14. Verse 14इस प्रकार जिस पुरुष को ज्ञातव्य वस्तु का ज्ञान हो चुका, उस पुरुष का आत्मा सुख और दुखों का…
  15. Verse 15इसलिए तत्त्वज्ञानी को संकटो में भी दुःख नही प्राप्त होता, प्रत्युत आनन्द ही रहता, ऐसा कहत…
  16. Verse 16सव कार्य, मन, बुद्धि उनके विषय ओर उनकी गतियो का मन ही बीज है, इसलिए मन का त्याग होने पर स…
  17. Verse 17कृत के भी अकृतत्व में दृष्टान्त कहते हैं। जैसे बालक मन से नगर का निर्माण ओर निर्मित नगर क…
  18. Verses 18–19इस प्रकार कर्तृत्व का विचार करके दुःख के कारण का विचार करते है । जगत में हेयता ओर उपादेयत…
  19. Verse 20इसलिये तत्त्वज्ञानियों की मोक्ष कल्पना भी नहीं है, ऐसा कहते है । जिसका मन पूर्ण आत्मा में…
  20. Verse 21ज्ञानी की दृष्टि तव क्या है। इस पर कहते है । ज्ञानी की दुष्टि में केवल यथास्थित आत्मतत्त्…
  21. Verse 22अब पद्य द्वारा फलितार्थ कहते है । न बन्धन है, न मोक्ष हे, न बन्धन का अभाव है ओर न बन्धन क…
  22. Verse 23उक्त पूणत्मिनिष्ठा का उपसंहार कर रहे श्रीवसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी के लिए उपदेश देते है ।…