Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 18 ,19
संस्कृत श्लोक
सर्वभावेषु हेयोपादेयताभ्यां जगति किं कारणं
दुःखस्य न चोपादेये किंचिदपि संभवति यदविनाशं व्यतिरिक्तं चात्मनस्तस्मादयमात्माऽकर्ताऽभोक्ताऽतत्त्वतो यदेतत्कर्तृत्वं च स्वध्यारोप्यते ॥ १८ ॥
आवश्यकं तत्सम्यग्दर्शनमोहान्न वस्तुत इति यथाभूतवस्तुविचारणात्कर्तृत्वभोक्तृत्वे न स्तः ।
इन्द्रियेन्द्रियार्थद्वेषाभिलाषादिका दृष्टयस्तद्दृष्टीनां दृश्यन्ते नातद्दृष्टीनाम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार कर्तृत्व का विचार करके दुःख के कारण का विचार करते है ।
जगत में हेयता ओर उपादेयता द्वारा व्यवहार के विषय सब पदार्थों में दुःख का कारण क्या है ? हेय
तो दुःख का कारण नहीं हो सकता, क्योकि त्याग उपादान पूर्वक होता है, हेय के उपादेय न होने से ही
उससे दुख की प्राप्ति नहीं हो सकती इसलिये परिशेष से उपादेय ही दुःख का हेतु है, ऐसा मानना
पड़ेगा | किन्तु उपादेय भी दुःख का कारण नहीं हो सकता । पहले यह बतलाइए, विनाशी उपादेय से
दुःख होता है, या अविनाशी से ? पहला पक्ष तो ठीक नहीं है, क्योकि विनाशी अपनी रक्षा करने में
समर्थ नहीं है, ऐसी अवस्था मेँ वह किसी का कारण हो, यह सम्भव नहीं ह । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है,
क्योकि उपादेय जगत में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो आत्मा से अतिरिक्त ओर अविनाशी हो।
अतोऽन्यदार्तम्" इत्याति श्रुति से आत्मा से अतिरिक्त सब विनाशी कहा गया है, भाव यह कि
आत्मा हानि ओर उपादान के अयोग्य हे ओर आत्मा से अतिरिक्त उपादेय नश्वर हे । इस तरह भोग्य
दुःख के कारण निरूपण न होने से आत्मा अकर्ता ओर अभोक्ता है । कर्तृत्व का अनुभव होता है, वह
अवास्तविकरूप से अध्यारोपित ह । उस कर्तृत्व का जीवित पुरुष से निवारण नहीं हो सकता यानी
जीवित पुरुष में कर्तृत्व अवश्य रहेगा ही, क्योकि : "नहि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्य शेषतः" ऐसा
भगवद्वाक्य है । उक्त कर्तृत्व सम्यग् ज्ञान के अभाव से है, वस्तुतः नहीं हे । तत््ववस्तु के विचार से तो
कर्तृत्व ओर भोक्तृत्व नहीं हँ । इन्द्रियों द्वारा इन्द्रियों के विषयों द्वेष, अभिलाषा आदि से एवं उसके
निमित्तभूत पुण्य-पापरूप अदृष्टो से विवश बुद्धिवाले अज्ञानियों के ही वे (कर्तृत्व-भोक्तृत्व) देखे
जाते है । इन्द्रियों के विषयों मे द्वेष्य अभिलाषा आदि से तथा उनके निमित्तभूत पुण्य-पापरूप अदृष्ट से
जिनकी बुद्धि विवश नहीं है, ऐसे ज्ञानियों के वे नहीं दिखाई देते