Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
यथास्थितं ज्ञस्य केवलमात्मतत्वमेवोल्लसति
तद्वित्वैकत्ववादिसिद्धे द्वित्वैकत्वे करोति सत्त्वासत्त्वे करोति शक्तिजालादभिन्नां सर्वशक्तितां च दर्शयति तस्य ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी की दृष्टि तव क्या है। इस पर कहते है ।
ज्ञानी की दुष्टि में केवल यथास्थित आत्मतत्त्व ही उल्लसित होता हे ।
शंका : यदि ज्ञानी की दृष्टि मे आत्मतत्व ही उल्लसित होता है, तो उसकी व्यवहार सिद्धि कैसे
होती है ?
समाधान : आत्मतत्व ही तत्त्वज्ञानी के जीवन आदि व्यवहार की सिद्धि के लिए द्वित्व-एकत्ववादियों
की दृष्टि से सिद्ध द्वित्व ओर एकत्व को जीवन आदि के व्यवहारके समय करता हे । सत्त्व ओर असत्त्व भी
करता है तथा शक्ति समूह से अभिन्न सर्वशक्तिता भी दिखाता हे