Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
तेन तत्र कर्तुरकर्तुर्वा नित्यमसंसक्तं भवतु चेतो नहि किंचिदस्त्यात्मतत्त्वव्यतिरिक्तं यत्र संसक्तिर्भाव्यते ।
यत्किंचिदिदं जगद्गतं तत्सर्वं शुद्धचित्तत्वादाभासमवेहि ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए चाहे आप कर्म कीजिये या न कीजिये। आपका
चित्त कर्मो मे सदा आसक्तिरहित हो । आत्मतत्त्व से अतिरिक्त कुछ भी नही है, जिसमें कि तत्त्वज्ञानी
आपकी आसक्ति की संभावना हो । इस जगत में यह जो कुछ भी हे, वह सब शुद्धचित् होने के कारण
केवल चित् का आभास ही है, ऐसा आप जानिये